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विदेश में नौकरी

विदेश की नौकरी और वो बातें जो ऑफर लेटर में नहीं लिखी होतीं

9 मिनट पढ़ें द्वारा TrustGlobe

ऑफर लेटर हाथ में है। शायद हाँ भी कह दिया होगा। और फिर उसी खुशी के बीच कहीं से एक सवाल निकलकर सामने आ खड़ा होता है — अब?

इसमें घबराने जैसा कुछ नहीं, यह सबके साथ होता है। बस मामला यह है कि विदेश जाना सिर्फ़ टिकट का मामला नहीं होता। उसके पीछे सौ छोटे-छोटे फ़ैसले एक कतार में खड़े रहते हैं, और इनमें से आधे के बारे में कोई आपको पहले से नहीं बताता। जो काश कोई मुझे पहले बता देता, वही नीचे लिख रहा हूँ।

जाने से पहले के वो आख़िरी हफ़्ते

सबसे उबाऊ काम सबसे पहले निपटा लीजिए, यानी कागज़ी कार्रवाई।

पासपोर्ट की वैधता देख लीजिए। कई देशों की शर्त रहती है कि आपके लौटने की तारीख़ के बाद भी वह कम से कम छह महीने और चले। वीज़ा, वर्क परमिट, हर चिट्ठी, हर रसीद — सब एक फ़ोल्डर में, और एक कॉपी क्लाउड पर भी। डिग्री, अनुभव के प्रमाणपत्र, जन्म और शादी के कागज़ात — इनके अनुवाद और अपोस्टिल या प्रमाणन की नौबत आ सकती है, सो यह झंझट यहीं निपट जाए तो बेहतर। वहाँ अनजान दफ़्तरों के चक्कर काटने में जो वक़्त और पैसा लगेगा, उससे यह सस्ता पड़ता है। और हाँ, जो चीज़ अक्सर छूट जाती है — मेडिकल और टीकाकरण के रिकॉर्ड, चश्मे का नंबर, रोज़ की किसी दवा का नुस्खा। ये भी साथ रहें।

घर की तलाश आज से ही शुरू कर दीजिए, पर सिर्फ़ तस्वीरों के भरोसे मत रहिए। हज़ारों किलोमीटर दूर बैठकर किसी अनजान शहर के फ़्लैट का पक्का सौदा कर लेना अक्लमंदी नहीं। शुरुआती एक-दो हफ़्ते के लिए कुछ अस्थायी ले लीजिए — गेस्टहाउस, किसी का शॉर्ट-स्टे कमरा, या कंपनी की दी हुई जगह। फिर वहाँ पहुँचकर, अपनी आँखों से इलाक़ा देखकर, ऑफ़िस तक की दूरी नापकर, इत्मीनान से घर तय कीजिए।

एक ठगी से ख़ास सावधान रहिए, क्योंकि नए लोगों के साथ यह बार-बार होती है। मकान-मालिक फ़्लैट दिखाए और चाबी थमाए बिना ही एडवांस माँग बैठता है। जगह देखे बिना, किसी भरोसेमंद से तसल्ली किए बिना, पैसा मत भेजिए।

अब पैसे की बात, जो असल में सबसे ज़्यादा परेशान करती है। पहली तनख़्वाह आने में पूरा महीना लग सकता है, कभी डेढ़ भी। उस बीच का सारा खर्च आपको अपने साथ ले जाना है — किराये का एडवांस, सिक्योरिटी डिपॉज़िट, शुरू के हफ़्तों का खाना-पीना, सिम, आना-जाना, और वो छुपे खर्च जो कहीं न कहीं से टपक ही पड़ते हैं। थोड़ी नक़दी उस देश की मुद्रा में लेकर चलिए ताकि उतरते ही टैक्सी या एक प्लेट खाने के लिए परेशान न होना पड़े। सारा भरोसा एक ही कार्ड पर मत रखिए — एक खो गया या ब्लॉक हुआ, तो दूसरा काम आता है।

घरवालों को बताना अपने आप में एक अलग ही किस्म का काम है। माँ-बाप, भाई-बहन, पुराने दोस्त। कोई खुश होगा, किसी की आँख भर आएगी, कोई आपको रोकने पर तुल जाएगा। उन्हें थोड़ा वक़्त दीजिए। और निकलने से पहले एक मोटा-सा इंतज़ाम तय कर लीजिए कि जुड़े कैसे रहेंगे — कौन-सा ऐप, बात किस दिन। सुनने में मामूली लगता है, मगर पहले महीने में यही बँधा रूटीन दोनों तरफ़ के लोगों को सँभाले रखता है।

भीतर भी कुछ चलता रहता है, चुपचाप। आप सिर्फ़ कहीं जा नहीं रहे, एक पुरानी ज़िंदगी का दरवाज़ा धीरे से भिड़ा रहे हैं। इसे महसूस होने दीजिए, दबाने की कोशिश मत कीजिए। और एक बात — जो लोग सबसे जल्दी बस जाते हैं, ऐसा नहीं कि उन्हें घबराहट सबसे कम होती है। बस वे मन में पहले ही मान चुके होते हैं कि शुरुआती दिन अटपटे रहेंगे।

क्या साथ ले जाएँ, और वो पहले दो दिन

सूटकेस का उसूल सीधा है। कपड़े और गैजेट हर जगह मिल जाते हैं, कागज़ नहीं मिलते। तो सबसे ऊपर दस्तावेज़, उसके नीचे वो चीज़ें जो वहाँ या तो मिलेंगी नहीं या बहुत महँगी पड़ेंगी — रोज़ की दवा, एक ढंग का यूनिवर्सल अडैप्टर, और मौसम के लिहाज़ से कुछ कपड़े जो उतरते ही पहनने पड़ें। बाक़ी सब वहीं ख़रीद लीजिएगा, सूटकेस लादने की ज़रूरत नहीं।

घर की दो-चार छोटी चीज़ें भी रख लीजिए। कोई तस्वीर, थोड़ा मसाला, कुछ ऐसा जिसकी महक से खाली कमरा अपना-सा लगने लगे। तीसरे हफ़्ते किसी सूनी शाम को इनकी क़ीमत समझ में आती है।

पहुँचते ही पहला काम — फ़ोन चालू कीजिए। एयरपोर्ट पर ही लोकल सिम ले लीजिए, या ई-सिम पहले से सेट करके रखिए। बिना नेट के अनजान शहर में अकेले भटकना बेकार की मुसीबत है। पते का स्क्रीनशॉट, पहुँचने का रास्ता, ऑफ़िस का कोई नंबर — ये ऑफ़लाइन भी पास रखिए, क्योंकि नेट हमेशा साथ देगा, ऐसा मानकर चलना ठीक नहीं।

पहले दिन से ज़्यादा कुछ मत चाहिए। पहुँचना, कुछ खा लेना, सो जाना — इतना काफ़ी है। थकान और नींद की कमी में लिए फ़ैसले बाद में भारी पड़ते हैं। ज़रूरी कागज़ी काम अगले दिन के लिए छोड़ दीजिए, जब सिर थोड़ा हल्का हो।

शुरुआती हफ़्ते: वो उबाऊ काम जिनसे बचा नहीं जा सकता

अब असली काम शुरू होता है। यही वह हिस्सा है जिसके लिए कोई आपको पहले से तैयार नहीं करता।

ज़्यादातर देशों में एक तय समय के भीतर अपना पता दर्ज कराना पड़ता है। और अक्सर यही पहली कड़ी बन जाता है जिससे बाक़ी सब जुड़ा होता है — इसके बिना न बैंक खाता खुलता है, न टैक्स नंबर मिलता है, न आगे का कोई काम सरकता है। तो इसे टालिए मत। पहले ही हफ़्ते में पता लगा लीजिए कि किस दफ़्तर जाना है और साथ क्या ले जाना है।

बैंक खाता इसके बाद का काम है, और कभी-कभी यहाँ एक अजीब फँसाव खड़ा हो जाता है: खाता खोलने के लिए पता माँगा जाता है, और पता दर्ज कराने में कहीं खाता पूछ लिया जाता है। ऐसे में आपका नियोक्ता या रिलोकेशन में मदद करने वाली एजेंसी अक्सर कोई शॉर्टकट जानती है, इसलिए पहले उन्हीं से पूछ लीजिए। तनख़्वाह तो खाता खुलने के बाद ही आएगी, सो इसे ऊपर ही रखिए।

स्वास्थ्य बीमा और इलाज का इंतज़ाम यह सोचकर मत टालिए कि बीमार ही कब पड़ना है। पता कीजिए कि कवर कब से चालू होता है, आपके लिए कौन-सा सिस्टम है — सरकारी या निजी — और तबीयत बिगड़ने पर सबसे पहले कहाँ जाना है। पास का डॉक्टर या क्लिनिक अभी देख लीजिए, उस वक़्त नहीं जब बुख़ार में पड़े तड़प रहे हों।

बाक़ी कुछ छोटे काम झटपट निपट जाते हैं और रोज़ की ज़िंदगी काफ़ी आसान कर देते हैं:

  • एक लोकल नंबर। बहुत से सरकारी और बैंकिंग वेरिफ़िकेशन इसी पर आते हैं।
  • आने-जाने का इंतज़ाम — मेट्रो या बस का कार्ड, और यह समझ कि सस्ता और भरोसेमंद रास्ता कौन-सा है। ऑफ़िस तक का रास्ता पहले हफ़्ते में एक बार आज़मा लीजिए, ताकि पहले दिन की हड़बड़ी न झेलनी पड़े।
  • एक भरोसेमंद डाक पता। कुछ सरकारी चिट्ठियाँ आज भी कागज़ पर ही आती हैं।

इन सबमें एक पेच है। हर देश का अपना तरीक़ा, अपनी कतार, अपने कागज़। किसी एक आदमी की बताई बात को आख़िरी सच मत मानिए। दफ़्तर जाने से पहले आधिकारिक सूची एक बार देख लीजिए, और एक-दो ज़रूरी कागज़ की फ़ालतू कॉपी जेब में रख लीजिए, क्योंकि दोबारा कतार में लगना किसी को नहीं भाता।

इंसानी पहलू, जिसे सब हल्के में लेते हैं

कागज़ तो किसी न किसी तरह निपट ही जाएगा। असली मुश्किल वह है जो किसी फ़ॉर्म में नहीं भरी जाती।

भाषा सबसे पहले टकराती है। कुछ हफ़्तों में फर्राटे से बोलने की उम्मीद किसी को नहीं रखनी चाहिए, होता भी नहीं ऐसा। पर बस चार बुनियादी शब्द — नमस्ते, शुक्रिया, माफ़ कीजिए, और कितने का है — दुकानदार से पड़ोसी तक सबका बर्ताव बदल देते हैं। फ़ोन में एक अनुवाद ऐप रखिए, इसमें शर्म कैसी; बस उसी के सहारे पूरी तरह मत बैठ जाइए।

फिर वह दौर आता है जिसके लिए कोई आगाह नहीं करता। पहले कुछ हफ़्ते अक्सर रोमांच में बीतते हैं — सब नया, सब दिलचस्प। फिर कहीं तीसरे-चौथे हफ़्ते के आसपास एक उतार आता है। छोटी-छोटी बातें खटकने लगती हैं। दुकान का किसी अजीब वक़्त बंद हो जाना। खाने का अनजाना स्वाद। वह मज़ाक़ जिस पर सब हँस पड़े और आप ताकते रह गए। घर की याद ज़ोर मारती है, और साथ में यह ख़याल भी कि कहीं कोई बड़ी ग़लती तो नहीं कर बैठे।

इसी को कल्चर शॉक कहते हैं। आम बात है, और इसका मतलब बस इतना है कि आपका दिमाग सचमुच एक नई दुनिया को समझने में जुटा हुआ है।

इस दौर में एक चीज़ सबसे ज़्यादा काम आती है — अपने जैसे लोग ढूँढना। दफ़्तर के सहकर्मी, आपकी भाषा या आपके देश के लोग, कोई हॉबी ग्रुप, खेल का मैदान, पूजा-स्थल, किसी समुदाय की कोई महफ़िल। कुछ भी, जहाँ आप महज़ “नया विदेशी कर्मचारी” न रहकर एक इंसान बन जाएँ। हफ़्ते में एक बार किसी के साथ बैठकर खाना खा लेना भी अकेलेपन को आधा कर देता है। पर यह अपने आप नहीं होगा, पहल आपको ही करनी पड़ेगी — भले शुरू में थोड़ा अटपटा लगे।

अगर परिवार भी साथ आ रहा है

यह अकेले आने से बिल्कुल अलग चुनौती है, और इसका एक सबक़ साफ़ है: पहले अकेले जाइए, परिवार को बाद में बुलाइए।

इसमें बेरुख़ी नहीं समझनी चाहिए, यह बस व्यावहारिकता है। पहले कुछ हफ़्ते आप जगह समझेंगे, पक्का घर लेंगे, बैंक और बीमा सेट करेंगे, स्कूलों की टोह लेंगे। ज़मीन थोड़ी जम जाए, तब परिवार का आना सब कुछ आसान कर देता है। उसके मुक़ाबले सबका एक साथ, घबराए-उलझे उतर पड़ना मुश्किल ही पैदा करता है।

बच्चों के साथ हों, तो स्कूल का दाख़िला अक्सर सबसे लंबी कड़ी निकलता है — दस्तावेज़, उम्र के हिसाब की कक्षा, और कभी प्रतीक्षा सूची भी। इसकी छानबीन घर बैठे ही शुरू कर दीजिए। और एक बात गाँठ बाँध लीजिए, जो किसी आँकड़े में नहीं मिलेगी: बच्चे नई भाषा बड़ों से कहीं तेज़ पकड़ते हैं, पर शुरू में घर की याद उन्हें ज़्यादा सताती है। उन्हें भी उतना ही वक़्त और उतनी ही समझ दीजिए जितनी आप ख़ुद को दे रहे हैं।

जीवनसाथी के लिए सबसे बड़ा सवाल अक्सर यही होता है — वहाँ उसे काम करने का हक़ मिलेगा या नहीं। यह आपके परमिट की क़िस्म पर टिका है, इसलिए परिवार के टिकट कटाने से पहले इसका दो-टूक जवाब निकाल लीजिए। बेमतलब, खाली दिनों में फँसा एक साथी धीरे-धीरे पूरे घर के मन पर बोझ बन जाता है।


ये शुरुआती हफ़्ते भारी लगते हैं, इसमें कोई शक़ नहीं। पर जो भी कभी विदेश गया है, उसने भी ठीक यही हफ़्ते काटे हैं — पता दर्ज कराने की कतारें, बैंक के चक्कर, वो तीसरे हफ़्ते की उदास शामें। फिर एक दिन अचानक आप मेट्रो में बिना नक़्शा खोले बैठे होते हैं, और ख़ुद को भी पता नहीं चलता कि यह कब हो गया।

तो जिस दिन फँसा हुआ महसूस हो, बस इतना याद रखिए कि न आप अकेले हैं, और न ही यह इस बात का इशारा है कि फ़ैसला ग़लत था।

और इस पूरे रास्ते में कहीं किसी साथ की ज़रूरत महसूस हो — कागज़ से लेकर घर ढूँढने तक — तो TrustGlobe इसीलिए है।

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